नया फ्लैट, नया मोहल्ला। आदित्य अभी-अभी दिल्ली से मुंबई शिफ्ट हुआ था। तीसरे दिन उसने देखा — बगल वाले फ्लैट में सुनीता रहती थी। उम्र कोई पैंतीस की, लंबे काले बाल, भरी हुई देह, और आँखों में एक अजीब सी उदासी।
पहली मुलाकात लिफ्ट में हुई। “नए हो?” उसने पूछा। “ज़रूरत हो तो बता देना। अकेले रहते हो ना?” उसके “अकेले” कहने के अंदाज़ में कुछ था।
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। कभी चीनी माँगने जाना, कभी खाना लेकर आना। एक शाम बारिश में बिजली चली गई। अँधेरा हो गया। सुनीता चाय लेकर आई — लाल सूट, हल्का मेकअप, चमेली की खुशबू।
मोमबत्ती की रोशनी में वो पास बैठी। बहुत पास। “तुम बहुत अच्छे लगते हो। पता है?” उसने आदित्य का हाथ पकड़ लिया। “डर गए?” उसने फुसफुसा कर पूछा।
“नहीं।” आदित्य ने कहा, और उसका हाथ सुनीता की कमर पर चला गया। चमेली की खुशबू और गहरी हो गई।
उस रात न आदित्य अकेला था, न सुनीता। एक दूसरे में उन्होंने अपनी कमी पूरी की।
