मुंबई की जुलाई की रात थी। आसमान से पानी नहीं, जैसे कोई अपनी सारी ग़म बहा रहा हो। नीलम अपने फ्लैट की खिड़की से बारिश देख रही थी। उसके बाल गीले थे, अभी-अभी नहा कर आई थी। काली साड़ी का पल्लू कंधे से फिसल कर कोहनी तक आ गया था।
उसे पता था कि आज देर तक कोई नहीं आएगा। राहुल, उसका पति, ऑफिस टूर पर गया था। घर खाली था। मन भी खाली था। या शायद भरा हुआ था — एक अजीब सी बेचैनी से।
अचानक डोरबेल बजी। उसने घड़ी देखी — रात के ग्यारह बज रहे थे। इतनी रात को कौन? उसने झट से पल्लू ठीक किया और दरवाज़ा खोला।
सामने विक्रम खड़ा था। उसका बचपन का दोस्त। पूरी तरह भीगा हुआ। सफ़ेद शर्ट उसके सीने से चिपकी हुई थी, बाँहों की माँसपेशियाँ साफ़ झलक रही थीं।
“नीलू… मेरा घर लॉक हो गया। चाबी अंदर छूट गई। इतनी बारिश में कहाँ जाता। तुझे याद आया।”
नीलम का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। विक्रम को देखे उसे ज़माना हो गया था। कभी स्कूल में साथ पढ़ते थे। कभी कुछ और भी था उनके बीच — एक अनकहा सा एहसास। जो कभी कहा नहीं गया।
“अंदर आ जा… भीग जाएगा।”
विक्रम अंदर आया। उसके क़दमों से फ़र्श पर पानी के निशान बन रहे थे। नीलम ने उसे तौलिया दिया। उनकी उँगलियाँ छू गईं। एक करंट सा दौड़ गया।
“तू वही है… बिल्कुल नहीं बदली।” विक्रम ने कहा, उसकी आवाज़ धीमी थी।
नीलम ने नज़रें झुका लीं। “चाय बनाती हूँ।” वो किचन की तरफ मुड़ी ही थी कि विक्रम ने उसकी कलाई पकड़ ली।
“चाय नहीं चाहिए।”
नीलम की साँस रुक गई। उसने पीछे मुड़ कर देखा। विक्रम की आँखों में वो बात थी जो कभी स्कूल की कैंटीन में, कभी कॉलेज के कॉरिडोर में, कभी उसकी शादी के मंडप में भी थी — बस कभी कही नहीं गई।
“विक्रम… मैं…”
“चुप। बस एक पल।” उसने अपना हाथ नीलम के गाल पर रखा। अँगूठे से उसके होंठों को छुआ। नीलम की आँखें बंद हो गईं।
बाहर बारिश तेज़ हो गई थी। बिजली चमकी, और उस रोशनी में विक्रम ने नीलम को अपनी बाँहों में भर लिया। उनके होंठ मिले। पहले धीरे, फिर गहराई से। सालों की चाहत, सालों की ख़ामोशी, सब कुछ पिघल कर बहने लगी।
नीलम की साड़ी का पल्लू फिर से फिसला। इस बार उसने रोका नहीं। विक्रम के हाथ उसकी कमर पर थे, उसे अपनी ओर खींच रहे थे।
“पता है… तेरी शादी के दिन मैं रोया था।” विक्रम ने उसके कान में फुसफुसाया। नीलम ने आँखें खोलीं। उनमें आँसू थे। “मैं भी… अंदर ही अंदर।”
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। और अंदर, दो रूहें आख़िरकार मिल रही थीं — बरसों की दूरी के बाद।
वो रात सिर्फ़ बारिश की नहीं थी। वो रात उन सब बातों की थी जो कभी कही नहीं गई थीं।
