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ऑफिस की वो शाम — जब पर्दे गिरे

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शाम के सात बजे थे। ऑफिस खाली हो चुका था। सिर्फ़ दो डेस्क पर लाइट जल रही थी — एक रिया की, एक अमन की।

रिया पिछले तीन महीने से इस ऑफिस में काम कर रही थी। और अमन उसका सीनियर था — शांत, रहस्यमय, हमेशा सफ़ेद शर्ट में।

रिया अक्सर उसे देखती थी। जिस तरह वो कोड लिखता, उसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर चलतीं — उसे देखना रिया के लिए एक अजीब सी तसल्ली थी।

“रिया, आज लेट हो गई?” अमन की आवाज़ ने उसे चौंका दिया। वो उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। उसकी खुशबू — परफ्यूम और कॉफ़ी — रिया के चारों ओर फैल गई।

“रिया, मैं तुम्हें पिछले तीन महीने से देख रहा हूँ। सिर्फ़ एक एम्प्लॉई की तरह नहीं।”

रिया का दिल रुकने को आया। उसने ऊपर देखा। अमन की आँखों में वो सच्चाई थी जो कम ही देखने को मिलती है।

“अगर तुम्हें भी… थोड़ा सा भी… वैसा ही लगता है जैसा मुझे… तो शायद ये पल हम फिर कभी न पा सकें।”

रिया ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने अमन का हाथ पकड़ लिया। “मैं भी… पिछले तीन महीने से… सिर्फ़ तुम्हें देख रही हूँ।”

उस शाम ऑफिस की खाली बिल्डिंग में दो दिलों ने एक नई कहानी लिखनी शुरू की।